तेरी साँसें ~ मेरी साँसें: तेरे अनुभव ~ मेरे संग

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मेरी कलम से तेरे अनुभव 

सोचता हूँ की तेरी हर चीज़ को कितनी आसानी से मैं ‘मेरा’ बना लेता हूँ ! 
तेरी दी हुई हर साँस को भी मैने अपना कह डाला । 
तेरे दिये हर अनुभव को भी अपना कह छाप डाला । 
फिर भी काफी कुछ मेरा होकर रह ही जाता हैं । 
जैसे… मेरी कलम… मेरे संग… मेरे द्वारा… 

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भूमिका 

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हर कवि का एक मुख्य भाव होता है 
और उसमें इक्की दुक्की भावना का 
मुख्यतः आभाव भी कसकर होता है । 

मेरा प्रचंड भाव है कटाक्ष व्यंग्य का, 
स्पष्ट दर्शन वक़्ता का, छुर्री की धार सा 
आशा करता हूँ की मेरे कटाक्ष वार से 
बहे लहू की धार से दर्शन तुम कर पाओगे 

आशा करता हूँ की तुम अपने प्रेम भाव से 
दया, भक्ति, प्रयास से वहीं पहुँच जाओगे 
क्यूँकि मुझमे आभाव है दयालू भाव का, 
प्रेम रस श्रिंगार का, और भक्ति भाव का 

देखने जो आया हूँ मैं इस जग संसार को 
इंसानियत के इस उभरते नए लिबास को 
आदमी के जिगर, जिस्म, और जज़्बात को 
लाया हूँ ख़ुदा का पैग़ाम देने हर इंसान को 

®©️ ~ तेरा रो:हित

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प्राक्कथन

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“ज़िंदगी हर वक़्त बहती है

बहुत ख़ामोशी से दस्तक देती है

अगर दरवाज़े खिड़कियाँ बंद हो

तो ज़िंदगी आगे बढ़ जाती है ।”

~ सुनीता सचदेव

“जीवन के सार को पकड़ना एक कला है”

रोहित “the first ray of the rising Sun” अपने नाम को सार्थक करता हुआ ।

जीवन का विस्तार अनुभव में छुपा है । अनुभव ही हमें दिशा देते हैं और हाँ व्यक्ति और परिस्थितियाँ हमारी प्रेरणा का स्त्रोत बन जाते हैं ।

‘तेरी साँसें ~ मेरी साँसें: तेरे अनुभव ~ मेरे संग’

यूँ तो जज़्बातों का कोई अपना रंग नहीं होता लेकिन आप उसे जिस रंग में देखना चाहें वो ठीक वैसी ही शक्ल अख़्तियार कर लेता है ।

रोहित का अपने अहम् को देख पाना जैसे ‘मेरी क़लम… मेरे संग… मेरे द्वारा’ उसके समर्पित भाव को दिखाता है।

रिश्तों की गहराई, समाज के प्रति दायित्व, बदलते हुए मानवीय मापदंड के प्रति कटाक्ष सटीक भूमिका निभाते हैं  – ‘ए मानव तू जाग’

कभी कभी बातें बहुत छोटी होती हैं लेकिन वो हमारे अंतर्मन को छू कर हमारे दृष्टिकोण को नई परिभाषा दे देती है ।

‘नानी दादी तू तो पुरानी हो गई’ में समाजिक व्यवस्था में आये परिवर्तन की ओर इशारा है ।

कहीं कहीं अपने अकेलेपन की छटपटाहट को भी बाख़ूबी पेश किया है – ‘मैं हूँ कुछ अधूरा सा…’

 “ना हो तन्हाईयों के ख़ौफ़ से इस क़दर परेशां

सुना है तन्हाईयों के साये तले इक शख़्स पनपता है ।”

~ सुनीता सचदेव

 

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